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6th | Hindi | |
| पाठ परिचय | ‘मातृभूमि’ कविता के कवि सोहनलाल द्विवेदी हैं। इस कविता में कवि ने अपनी मातृभूमि भारत के प्रति प्रेम, श्रद्धा और गर्व की भावना व्यक्त की है। कवि भारत की प्राकृतिक सुंदरता, पवित्र नदियों, विशाल हिमालय, हरे-भरे खेतों तथा समृद्ध संस्कृति का वर्णन करता है। कवि बताता है कि भारत महान संतों, ऋषियों, महापुरुषों और अवतारों की पवित्र भूमि है। यह धर्म, ज्ञान, त्याग और कर्म की भूमि है। भारत की प्राकृतिक छटा और सांस्कृतिक विरासत पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह कविता विद्यार्थियों के मन में देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति, मातृभूमि के प्रति सम्मान तथा अपने देश के गौरव को बनाए रखने की प्रेरणा उत्पन्न करती है
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| लेखक / कवि परिचय | सोहनलाल द्विवेदी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध राष्ट्रभक्त कवि थे। उनका जन्म 22 फ़रवरी 1906 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में हुआ था। उनकी कविताओं में देशभक्ति, राष्ट्रीय चेतना, नैतिक मूल्यों और प्रेरणा का भाव प्रमुख रूप से दिखाई देता है। सोहनलाल द्विवेदी ने सरल एवं प्रभावशाली भाषा में अनेक कविताएँ लिखीं, जो बच्चों और युवाओं में देशप्रेम की भावना जगाती हैं। उनकी रचनाओं में मातृभूमि के प्रति प्रेम, त्याग, साहस और कर्तव्य का संदेश मिलता है। वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से भी प्रभावित थे और अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों में राष्ट्रप्रेम का संचार करते थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में "मातृभूमि", "भैरवी", "पूजागीत", "वासवदत्ता" आदि शामिल हैं। उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए।
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| पाठ का सारांश | "मातृभूमि" कविता के कवि सोहनलाल द्विवेदी हैं। इस कविता में कवि ने अपनी मातृभूमि भारत के प्रति गहरा प्रेम, सम्मान और गर्व व्यक्त किया है। कवि भारत की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक समृद्धि और आध्यात्मिक महानता का वर्णन करता है।
कवि कहता है कि भारत के उत्तर में विशाल हिमालय पर्वत आकाश को छूता हुआ खड़ा है, जबकि दक्षिण में समुद्र इसके चरणों को धोता है। गंगा, यमुना और त्रिवेणी जैसी पवित्र नदियाँ इस भूमि को पावन बनाती हैं। हरे-भरे खेत, सुंदर वन, आम के बगीचे और सुगंधित हवाएँ भारत की शोभा को और बढ़ाती हैं।
यह वही पवित्र भूमि है जहाँ भगवान राम, माता सीता, भगवान कृष्ण, गौतम बुद्ध तथा अनेक ऋषि-मुनियों और महापुरुषों ने जन्म लिया। इन महान विभूतियों ने अपने आदर्शों, ज्ञान, त्याग और सत्कर्मों से संसार को मार्ग दिखाया। इसलिए भारत को धर्म, ज्ञान और कर्म की भूमि कहा जाता है।
कवि अपनी मातृभूमि की महिमा का वर्णन करते हुए कहता है कि भारत केवल प्राकृतिक सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, सभ्यता और महान परंपराओं के कारण भी संसार में विशेष स्थान रखता है। यहाँ के लोगों में प्रेम, दया, त्याग, सत्य और परोपकार की भावनाएँ विद्यमान हैं।
अंत में कवि अपनी मातृभूमि को नमन करता है और उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है। कविता हमें अपनी जन्मभूमि से प्रेम करने, उसका सम्मान करने तथा उसके गौरव को बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
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| कठिन शब्दार्थ | • मातृभूमि — जन्मभूमि, अपना देश। • हिमालय — भारत के उत्तर में स्थित विशाल पर्वत। • त्रिवेणी — गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम। • अमराइयाँ — आम के बगीचे। • मलय पवन — सुगंधित और शीतल हवा। • पुनीत — पवित्र, शुद्ध। • सुयश — अच्छी कीर्ति, यश। • वंशी — बाँसुरी। • रघुपति — भगवान श्रीराम। • धर्मभूमि — धर्म और सदाचार की भूमि। • कर्मभूमि — कर्म करने की भूमि। • विभूति — महान व्यक्ति। • गौरव — सम्मान, प्रतिष्ठा। • चरण — पैर, पाँव। • वसुधा — पृथ्वी। • पावन — पवित्र। • जननी — माता। • नमन — प्रणाम, सम्मानपूर्वक झुकना। • शस्य-श्यामला — हरी-भरी फसलों से युक्त भूमि। • सुरभित — सुगंधित, खुशबूदार।
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| केंद्रीय भाव | इस कविता का मुख्य भाव देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति और मातृभूमि के प्रति सम्मान है। कवि देशवासियों को अपनी मातृभूमि से प्रेम करने तथा उसके विकास और रक्षा के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है।
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| निर्जीव (Non-living Things) | परिभाषा
जिन वस्तुओं में जीवन नहीं होता तथा जो जीवन-प्रक्रियाएँ नहीं करतीं, उन्हें निर्जीव कहते हैं।
उदाहरण
• पत्थर
• कुर्सी
• मेज
• पेंसिल
• काँच
• मिट्टी
• खिलौना
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