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दुर्गा सप्तशती पाठ

दुर्गा सप्तशती को देवी माहात्म्य, चण्डी पाठ अथवा श्री चण्डी भी कहा जाता है। यह शक्ति उपासना का सर्वोच्च ग्रंथ माना जाता है। यह मार्कण्डेय पुराण का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें कुल १३ अध्याय और लगभग ७०० श्लोक हैं। इसी कारण इसका नाम "सप्तशती" पड़ा, जिसका अर्थ है—सात सौ श्लोकों का संग्रह।
यह ग्रंथ आदिशक्ति की तीन प्रमुख शक्तियों—महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती—की महिमा, उनके दिव्य स्वरूप और असुरों के विनाश की कथा का वर्णन करता है। श्रद्धा, शुद्धता और नियमपूर्वक किया गया सप्तशती पाठ साधक के जीवन में साहस, आत्मबल, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
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दुर्गा सप्तशती का महत्व
सनातन परंपरा में यह विश्वास है कि जब भी धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश की आवश्यकता होती है, तब देवी विभिन्न रूपों में अवतरित होकर संसार की रक्षा करती हैं। सप्तशती उन्हीं दिव्य लीलाओं का वर्णन है।
इसका नियमित पाठ करने से—
• मानसिक भय दूर होता है।
• नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम होता है।
• आत्मविश्वास और मनोबल बढ़ता है।
• परिवार में सुख-शांति का वातावरण बनता है।
• आध्यात्मिक साधना में प्रगति होती है।
• देवी की कृपा प्राप्त होने का विश्वास किया जाता है।
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दुर्गा सप्तशती की संरचना
सप्तशती तीन मुख्य भागों में विभाजित है।

1. प्रथम चरित्र (महाकाली)
अध्याय 1
इसमें देवी के महाकाली स्वरूप का वर्णन है। भगवान विष्णु की योगनिद्रा से देवी प्रकट होकर मधु और कैटभ नामक असुरों के विनाश में सहायक बनती हैं।
भावार्थ
यह चरित्र अज्ञान, आलस्य और अहंकार पर विजय का प्रतीक माना जाता है।
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2. मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी)
अध्याय 2 से 4
इस भाग में महिषासुर के अत्याचारों का वर्णन है। सभी देवताओं के तेज से देवी महालक्ष्मी प्रकट होती हैं और महिषासुर का संहार करती हैं।
भावार्थ
यह भाग धर्म की विजय और अन्याय के अंत का संदेश देता है।
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3. उत्तर चरित्र (महासरस्वती)
अध्याय 5 से 13
इसमें शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड, मुण्ड, रक्तबीज तथा अन्य असुरों का वध वर्णित है।
भावार्थ
यह भाग मनुष्य के भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध और मोह पर विजय का प्रतीक है।
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सप्तशती पाठ कब किया जाता है?
यद्यपि इसका पाठ वर्ष भर किया जा सकता है, फिर भी कुछ अवसर विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं—
• चैत्र नवरात्रि
• शारदीय नवरात्रि
• अष्टमी
• नवमी
• शुक्रवार
• मंगलवार
• विशेष मनोकामना अथवा पारिवारिक मंगल कार्यों के अवसर पर
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पाठ करने से पहले की तैयारी
पाठ से पहले शरीर, मन और स्थान की शुद्धि का विशेष ध्यान रखा जाता है।
आवश्यक सामग्री—
• स्वच्छ लाल अथवा पीला आसन
• देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र
• कलश
• नारियल
• अक्षत
• पुष्प
• लाल चुनरी
• धूप
• दीपक
• कपूर
• रोली
• चंदन
• नैवेद्य
• गंगाजल
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पाठ की संपूर्ण विधि

1. स्नान एवं शुद्धि
प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन को शांत रखें।
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2. पूजन स्थान की तैयारी
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। देवी का चित्र स्थापित करें।
दीपक जलाएँ।
धूप अर्पित करें।
गणेश जी का स्मरण करें।
गुरु एवं कुलदेवता का ध्यान करें।
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3. संकल्प
अपने नाम, गोत्र (यदि ज्ञात हो), स्थान तथा पाठ के उद्देश्य का संकल्प लें।
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4. प्रारम्भिक पाठ
परंपरा के अनुसार मुख्य पाठ से पहले निम्न स्तोत्रों का पाठ किया जाता है—
• देवी कवच
• अर्गला स्तोत्र
• कीलक स्तोत्र
इनके पश्चात् नवाक्षरी मंत्र का जप किया जाता है।
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5. मुख्य सप्तशती पाठ
१३ अध्याय क्रम से पढ़े जाते हैं।
बीच में किसी अध्याय को छोड़ना उचित नहीं माना जाता।
यदि एक दिन में पूरा पाठ संभव न हो, तो निर्धारित क्रम के अनुसार कई दिनों में भी किया जा सकता है।
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6. समापन
सभी अध्याय पूर्ण होने के बाद—
• देवी सूक्त
• रहस्य त्रय (परंपरा अनुसार)
• क्षमा प्रार्थना
• आरती
• पुष्पांजलि
की जाती है।
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नवरात्रि में नौ दिनों का पाठ-विभाजन
एक प्रचलित क्रम इस प्रकार है—
दिन अध्याय
प्रथम अध्याय 1
द्वितीय अध्याय 2
तृतीय अध्याय 3
चतुर्थ अध्याय 4
पंचम अध्याय 5–6
षष्ठ अध्याय 7–8
सप्तम अध्याय 9–10
अष्टमी अध्याय 11
नवमी अध्याय 12–13
यह केवल एक प्रचलित व्यवस्था है; विभिन्न परंपराओं में क्रम भिन्न भी हो सकता है।
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पाठ करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
• उच्चारण यथासंभव शुद्ध रखने का प्रयास करें।
• यदि किसी शब्द में त्रुटि हो जाए तो घबराएँ नहीं; श्रद्धा और एकाग्रता अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
• पाठ के समय मोबाइल, अनावश्यक बातचीत तथा व्यवधान से बचें।
• सात्त्विक भोजन ग्रहण करें।
• क्रोध, कटु वाणी और असत्य से यथासंभव दूर रहें।
• प्रतिदिन एक ही समय पर पाठ करना शुभ माना जाता है।
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सप्तशती के आध्यात्मिक संकेत
सप्तशती की कथाएँ केवल युद्ध का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि मानव-मन के आंतरिक संघर्षों का भी प्रतीकात्मक चित्रण करती हैं।
• महिषासुर – अहंकार और पशु-प्रवृत्ति
• रक्तबीज – बढ़ती हुई नकारात्मक इच्छाएँ
• चण्ड-मुण्ड – क्रोध और हिंसक प्रवृत्तियाँ
• शुम्भ-निशुम्भ – अभिमान और स्वार्थ
देवी इन सभी पर विजय प्राप्त करके यह संदेश देती हैं कि साधना, विवेक और आत्मबल से मनुष्य अपने भीतर की दुर्बलताओं को जीत सकता है।
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सप्तशती पाठ के पारंपरिक फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक किया गया सप्तशती पाठ—
• भय का नाश करता है।
• मानसिक शांति प्रदान करता है।
• आत्मबल बढ़ाता है।
• पारिवारिक सौहार्द को प्रोत्साहित करता है।
• आध्यात्मिक साधना को दृढ़ बनाता है।
• देवी के प्रति भक्ति और समर्पण को गहरा करता है।
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